गिरता भूजल और रसायनों से ऊजड़ती जमीन के बीच चित्रकूट में 'खेत बचाओ' की गूंज, 245 किसान तैयार, पर क्या सरकार भी तैयार है?
गिरता भूजल और रसायनों से ऊजड़ती जमीन के बीच चित्रकूट में 'खेत बचाओ' की गूंज, 245 किसान तैयार, पर क्या सरकार भी तैयार है?
चित्रकूट।
भारत सरकार के कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय द्वारा संचालित "खेत बचाओ
अभियान" के तहत रविवार को कृषि विज्ञान केंद्र, गनीवा ने विकासखंड मानिकपुर
के डाडीकोला, झरी, करौहा, जारोमाफी समेत अनेक गाँवों में प्रशिक्षण एवं
जन-जागरूकता कार्यक्रम आयोजित किए। इस दौरान कुल 245 किसानों को रासायनिक
उर्वरकों के संतुलित उपयोग, जैविक खेती और जलवायु अनुकूल कृषि पद्धतियों की
ट्रेनिंग दी गई।
कृषि
वैज्ञानिकों ने किसानों को मिट्टी की उर्वरा शक्ति बनाए रखने के लिए गोबर
की खाद, वर्मी कम्पोस्ट, NADEP कम्पोस्ट और फसल अवशेष आधारित जैविक खादों
का उपयोग बढ़ाने की सलाह दी। जिले में लगातार गिरते भूजल स्तर पर चिंता
जताते हुए किसानों को धान की जगह दलहन, तिलहन और मोटे अनाज की खेती अपनाने
के लिए प्रेरित किया गया। साथ ही मौसम आधारित कृषि प्रबंधन और कम अवधि वाली
उन्नत किस्मों के चयन पर भी जोर दिया गया।
इस सराहनीय पहल के बीच आम जनता और किसानों के मन में कुछ स्वाभाविक प्रश्न उठ रहे हैं।
जिले में भूजल स्तर की गिरावट कोई नई बात नहीं है। क्या यह पहली बार है जब किसानों को धान छोड़कर दूसरी फसलों की सलाह दी जा रही है, या पहले भी ऐसे प्रयास हुए और उनके नतीजे क्या रहे? जैविक खाद और प्राकृतिक संसाधनों के इस्तेमाल की सीख देने के बाद क्या प्रशासन और कृषि विभाग की ओर से किसानों को वर्मी कम्पोस्ट यूनिट, NADEP टैंक या दूसरे संसाधन उपलब्ध कराने की कोई ठोस योजना है? बिना संसाधन के सिर्फ प्रशिक्षण कितना कारगर साबित होगा, यह भी एक सवाल है।
मोटे अनाज की खेती की सलाह तो दे दी गई, लेकिन किसानों के सामने सबसे बड़ी
चुनौती इन फसलों की बिक्री और उचित मूल्य की होती है। क्या प्रशासन ने
बाजार और मंडी की व्यवस्था को लेकर भी कोई रूपरेखा बनाई है? 245 किसानों को जागरूक किया गया, जो निश्चित तौर पर सकारात्मक कदम है।
लेकिन जिले में किसानों की कुल संख्या के लिहाज से यह आँकड़ा कितना प्रभावी
है? क्या अभियान को और व्यापक स्तर पर ले जाने की योजना है?
कार्यक्रम
में शामिल किसानों ने मिट्टी के स्वास्थ्य संरक्षण और टिकाऊ कृषि
पद्धतियों को अपनाकर "खेत बचाओ, भविष्य बचाओ" के संकल्प को साकार करने का
विश्वास जताया। किसानों की इस सकारात्मक सोच के बीच उम्मीद की जानी चाहिए
कि सरकार और प्रशासन भी उनके इस संकल्प को सही मायने में बल देने के लिए
जमीनी संसाधन और बाजार की व्यवस्था सुनिश्चित करेगा।
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