26,000 स्कूल बंद! 90% पिछड़ों और गरीबों की पढ़ाई पर ताला— UP में क्या शिक्षा का अंत हो रहा है?
26,000 स्कूल बंद! 90% पिछड़ों और गरीबों की पढ़ाई पर ताला— UP में क्या शिक्षा का अंत हो रहा है?
लखनऊ। उत्तर प्रदेश की शिक्षा व्यवस्था गहरे संकट से गुजर रही है। एक तरफ सरकार 'नए भारत' और 'डिजिटल क्रांति' के
नारे लगा रही है, तो दूसरी तरफ नीति आयोग की रिपोर्ट और UDISE+ के आंकड़े
एक चिंताजनक सच्चाई सामने रखते हैं। देशभर में पिछले एक दशक में लगभग
94,000 सरकारी स्कूल बंद हो चुके हैं—यानी हर दिन करीब 25 स्कूल। उत्तर
प्रदेश में अकेले 2017 के बाद 26,000 से अधिक सरकारी प्राइमरी स्कूल बंद कर
दिए गए हैं। 2017 में जहां 1,13,938 स्कूल थे, वहीं 2026 तक यह संख्या
घटकर लगभग 89 लाख नामांकन वाले स्कूलों तक सिमट गई है। सीधा गणित है—औसतन
हर दिन करीब 8 स्कूल बंद हुए हैं। सरकार इसे 'तर्कसंगतीकरण' (Rationalisation) कहती है, लेकिन सवाल यह है कि इसकी मार सबसे गरीब और वंचित बच्चों पर ही क्यों पड़ रही है?
बंद स्कूलों का गणित: कहां से हुई सबसे ज्यादा तबाही?
जिलेवार
आंकड़ों पर गौर करें तो सबसे ज्यादा तबाही लखीमपुर खीरी में हुई, जहां 758
स्कूल बंद किए गए। इसके बाद सीतापुर (650), प्रयागराज (638) और
मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के गृह जिले गोरखपुर में लगभग 500 स्कूल बंद
हुए हैं। ये आंकड़े विपक्षी नेता अखिलेश यादव ने विधानसभा सत्र से पहले एक
प्रेस कॉन्फ्रेंस में सार्वजनिक किए हैं। सरकार का कहना है कि कम छात्र
संख्या वाले स्कूलों को पास के बड़े स्कूलों में मर्ज किया जा रहा है,
लेकिन आलोचकों का सवाल है—क्या गरीब बच्चों को 5-10 किलोमीटर दूर पैदल
भेजने से पहले बुनियादी ढांचा तैयार किया गया? स्कूल बंद होने के बाद
बच्चों को 4 से 6 किलोमीटर दूर स्कूल जाना पड़ रहा है, जो RTE अधिनियम के 'पड़ोसी स्कूल' सिद्धांत का उल्लंघन है।
बेटियों पर सबसे भारी पड़ा स्कूल बंद होना
इस
त्रासदी का सबसे भयावह चेहरा बेटियों पर पड़ा है। आंकड़ों के मुताबिक,
सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाली लड़कियों की संख्या 2017 में 61.57 लाख थी,
जो घटकर अब लगभग 45 लाख रह गई है। यानी करीब 16 लाख बेटियाँ स्कूल छोड़
चुकी हैं या उनका नामांकन घट गया है। जब बेटी पढ़ेगी नहीं, तो आगे बढ़ेगी
कैसे? वहीं दूसरी ओर शिक्षकों की कमी ने पूरे सिस्टम को पंगु बना दिया है।
लोकसभा में पेश आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, उत्तर प्रदेश में कक्षा 1 से 8
तक 1,26,028 शिक्षकों के पद खाली हैं। 2017 में जहां लगभग 4 लाख शिक्षक कार्यरत थे, वहीं अब यह संख्या 3.40 लाख रह गई है।
कारोबार मॉडल: सरकारी स्कूल बंद, निजी स्कूल खुले
यह
कोई इत्तेफाक नहीं है कि जिस रफ्तार से सरकारी स्कूल बंद हो रहे हैं, ठीक
उसी अनुपात में निजी स्कूलों का साम्राज्य फैल रहा है। UDISE+ डेटा के
अनुसार, देश में सरकारी स्कूलों की संख्या 2014-15 में 11.07 लाख से घटकर
2023-24 में 10.17 लाख रह गई, जबकि इसी अवधि में निजी स्कूल 2.88 लाख से
बढ़कर 3.31 लाख हो गए। उत्तर प्रदेश में सबसे ज्यादा 7,873 नए निजी स्कूल
खुले हैं। सरकारी स्कूलों में नामांकन 2005 के 71% से गिरकर 2024-25 में
49.24% पर आ गया है। अब गरीब के सामने या तो बच्चों को पढ़ाई छुड़वाकर
मजदूरी पर लगाना है, या निजी स्कूलों की मोटी फीस भरने के लिए कर्ज में
डूबना है।
बिन बिजली-पानी के स्कूल: क्या पढ़ेंगे गरीब बच्चे?
जो
स्कूल बचे भी हैं, वहाँ की हालत किसी 'अंधेरे कुएँ' से कम नहीं है। आंकड़े
बताते हैं कि प्रदेश के लगभग 7,000 स्कूलों में बिजली नहीं है, 2,300
स्कूलों में लड़कियों के लिए शौचालय नहीं है, 576 स्कूलों में पीने का साफ
पानी नहीं है, और 23,000 स्कूलों में कंप्यूटर शिक्षा की कोई सुविधा नहीं
है। ऐसे हालात में पढ़ाई का स्तर क्या होगा, यह बताने की जरूरत नहीं है।
Oxfam India की एक रिपोर्ट के अनुसार, 18.5% शिक्षकों के पास पेशेवर
योग्यता भी नहीं है।
आखिर सरकारी खजाना बचाने की चाल या शिक्षा पर हमला?
सरकार इस पूरे खेल को 'तर्कसंगतीकरण' का नाम देती है। NEP 2020 भी स्कूलों के विलय की बात करता है, लेकिन इस शर्त के साथ कि 'पड़ोसी स्कूल'
की अवधारणा खतरे में न पड़े। हकीकत यह है कि यह गरीबों की शिक्षा पर सीधा
असर डाल रहा है। नीति आयोग की रिपोर्ट के अनुसार, स्कूल बंद होने से
ड्रॉपआउट दर बढ़ रही है—उच्च प्राथमिक स्तर पर उत्तर प्रदेश में ड्रॉपआउट
दर 12.3% और माध्यमिक स्तर पर 18.7% है। ये बच्चे फिर सड़कों पर आ जाते
हैं—या तो मजदूरी करते हैं, या अपराध की तरफ धकेल दिए जाते हैं।
अब
वक्त आ गया है कि इस सवाल का जवाब माँगा जाए कि आखिर ये स्कूल क्यों बंद हो
रहे हैं? क्या यह सरकारी खजाना बचाने की चाल है, या जानबूझकर गरीब, दलित
और पिछड़े बच्चों को शिक्षा से दूर कर अमीरों के लिए सस्ती मजदूर सेना
तैयार करने की साजिश? जवाब चाहे जो भी हो, इतना तय है कि अगर अब भी आँखें
नहीं खुलीं, तो भारत का भविष्य सिर्फ निजी स्कूलों में पढ़ने वाले अमीरों
के कंधों पर नहीं चल सकता। गरीब बच्चों की कलम छीनी गई, तो यह देश सिर्फ
तरक्की के नारे लगाता रह जाएगा, अंधेरे में डूबता रहेगा।
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